शिक्षकों द्वारा ओल चिकी लिपि के विरोध पर परसी आरीचली मरांङ बुरू आखडा़ ने कड़ा विरोध जताया। (संताल परगना)

 प्रेस रिलीज         दिनांकः24-01-2025

*शिक्षको दुवारा ओलचिकी लिपि के  विरोध पर परसी आरीचली मारांबुरु आखड़ा ने कड़ा विरोध जताया* 

दुमका : एसकेएमयू के शिक्षको दुवारा संताल आदिवासी के ओलचिकी लिपि का विरोध करने पर संताल परगाना महाविद्यालय के परिसर में आरीचली मारांबुरु आखड़ा के बैनर तले छात्रों और समाजसेवियों ने बैठक किया और इन शिक्षको पर कड़ा एतराज व्यक्त किया.ज्ञात हो कि झारखण्ड केन्द्रीय विश्वविद्यालय,रांची में 20-21 जनवरी को “आथर वर्कशाप ऑन एकेडमिक राइटिंग टू डेवलप टैक्स बुक फॉर हायर एजुकेशन इन भारतीय लैंग्वेज संताली” पर कार्यशाला रखा गया था. जिसमे एसकेएमयू के संताली विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ सुशील टुडू,डॉ शर्मिला सोरेन,निर्मल मुर्मू ,डॉ अंजुला मुर्मू,डॉ स्वपन मुर्मू,मनोज मुर्मू ,सुमित्रा हेम्ब्रम आदि  ने ओलचिकी लिपि को लेकर विरोध किया और चेताया कि यदि ओलचिकी लिपि को बढ़ावा दिया जाता है तो आन्दोलन किया जायेगा. इसको लेकर छात्र,समाजसेवी और अखड़ा काफी नाराज और गुस्से में है. अखड़ा का कहना है कि ये सभी शिक्षक ओलचिकी लिपि का विरोध कर मुख्य उद्देश्य से भटक रहे हैं। अखड़ा का कहना है कि अगर किसी भाषा का लिपि नहीं है तो वह भाषा कभी विकसित नहीं हो सकती है।अन्य भाषा में संताली को देवनागरी, रोमन, ओड़िया, बंगाली, असमिया या भारत देश की अन्य लिपि में लिख सकते है लेकिन वह परजीवी भाषा व लिपि पर निर्भर होगा ।छात्रों और अखड़ा के अनुसार पूरी दुनिया में भाषा संरक्षण और सतत विकास पर कार्य हो रहे तो ओलचिकि लिपि पर क्यों नहीं ? छात्रों और अखड़ा का कहना है कि इस विषय पर शिक्षक राजनीति कर रहे है। अखड़ा ने आगे कहा यह सभी शिक्षक आदिवासियों के  संस्कृति,सभ्यता और आदिवासी के विरोधी है और आदिवासी समाज को आघात पहुँचाने वाले व्यक्ति है जो आदिवासी समाज को बाटने का प्रयास कर रहे है. संताली भाषा सरकार के आठवीं अनुसूची में शामिल हैं और बिहार,बंगाल,उड़ीसा,असाम आदि राज्यों में बोली भी जाती है और कई राज्यों में ओलचिकी लिपि से सरकारी स्कूल और कॉलेजों में पढ़ाया भी जा रहा है.अखड़ा का यह भी कहना है कि ये सभी शिक्षक सिर्फ और सिर्फ राजनीति में अपना चेहरा चमकाने और आदिवासियों को बाटने के उदेश्य से ओलचिकी का विरोध कर रहे हैं।जबकि शिक्षक होने के नाते इन्हें राजनितिक से दूर रहकर शिक्षण कार्य संताली भाषा और ओलचिकी लिपि का विकास कैसे हो उसपर केंद्रित होकर इस पर कार्य करना  श्रेयस्कर होता. अखड़ा ने कहा कि जरुरत पड़े तो इस आन्दोलन को शहर से गांवो तक ले जाया जायेगा.इस बैठक में परेश मुर्मू, सुनील टुडू, लालटु मारांडी, कमीश्नर मुर्मू, बादल मारांडी, रासबिहारी मारांडी, बाबुशल सोरेन, संजीव टुडू, पवन मुर्मू, मनोज सोरेन आदि उपस्थित थे।

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